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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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ध्यान विषयक

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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ज्ञान स्वरूप है, आनंद स्वरूप है और प्राणी मात्र का सहृद है, उसको हम कैसे पायें । जिसको हम छोड़ नही सकते उसको कैसे पायें ? और जिसको हम रख नही सकते उसकी वासना कैसे मिटायें ?

पूज्य श्री - सुरेशानंदजी प्रश्नोत्तरी

पूज्य बापूजी - वह  ज्ञान स्वरूप है, आनंद स्वरूप है और प्राणी मात्र का सहृद है, उसको हम कैसे पायें । जिसको हम
छोड़ नही सकते उसको कैसे पायें ? और जिसको हम रख नही सकते उसकी वासना कैसे मिटायें ?


श्री सुरेशानंदजी - साधन भी गुरुदेव हमे सत्संग में बताते ही है। भगवान कृष्ण ने भी इसके बारे में गीते के १३वे
अध्याय में बहुत ही सुंदर ढंग से बताया है।  भगवान कृष्ण भी वही कर रहे थे जो आज पूज्य बापूजी कर रहे है। और
हम लोग वही कर रहे है जो बीच बीच में अर्जुन भी कर थे।  परन्तु अर्जुन जी की एक बहुत बड़ी विशेषता रही की
भले वो बीच बीच में  भगवान् की बात कह रहे थे, शंका कर रहे थे की आप ये जो कह रहे हो आपने ये ज्ञान सूर्य
को दिया था, सूर्य ने मनु को दिया था, मनु जी ने इक्ष्वाकु  को दिया था।  तो आप तो अब के है, सूर्य तो कब के
है । आपने सूर्य को कैसे दिया, ये शंका की।  भगवान् ने कहा के अर्जुन तेरे और मेरे कई जन्म हुए है।  तुम जानते
नही हो, मैं जनता हूँ | 

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ||
तो अर्जुन ने ये बात सुनकर फिर दुबारा तर्क नहीं किया।  बीच बीच में प्रश्न शंका जरुर कर रहे है।  पर भगवान् की
हाँ में हाँ मिलाते गये।  तो विषाद से शुरू हुई भगवत गीता वो सत्य की विजय यात्रा पर पूरी हो गयी।

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