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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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Admin
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पूज्य श्री - घाट वाले बाबा प्रश्नोत्तरी भाग 1

बापूजी : हाथ मिलाओ | ठीक है | अच्छा जी, इनको बता दो आत्मज्ञान कैसे होता है ?
घाट वाले बाबाजी : आत्मज्ञान चाहिए ! आत्मज्ञान बता दूँ ! मान लोगे ! नहीं माने तो |
बापूजी : नहीं मान लेंगें , मान लेंगें , मान लोगे ना, हाँ मान लेंगें !
घाट वाले बाबाजी : मान लेगा, तू ही आत्मा है, देह नहीं है | मान लिया |
बापूजी : हाँ, मान तो लिया जमता नहीं है |
घाट वाले बाबाजी : जमाओ, जमाओ उसमें रोज पानी दो |
साधक : वो तो मान लिया | व्यवहार में आता है ना तो थोड़ी खिचड़ी |
घाट वाले बाबाजी : व्यवहार को आग लगाओ | पहले ये दृढ़ करो, फिर व्यवहार करो | ठीक रहेगा |
पहले व्यवहार ठीक करना चाहते हैं |
बापूजी : बोध दृढ़ करो फिर व्यवहार |
घाट वाले बाबाजी : फिर जो करेगा सब ठीक हो जायेगा | ज्ञान प्राप्त करके फिर व्यव्हार करो, व्यवहार
भी फिर अदब से हो जायेगा |
साधक : व्यवहार में जो खोटू, खरु करनू पड़े तो खोता करना पड़े, तो दिल में दुःख होता है |
घाट वाले बाबाजी : दिल में होने दो, आत्मा में तो नहीं है ना | दिल का दुःख अपने में नहीं मानो |
साधक : पन जो खोता-खरा जो होवे छो |
घाट वाले बाबाजी : अपने में तो नहीं है |
साधक : हाँ, अपने में तो नहीं है | पण ….
घाट वाले बाबाजी : होगा भी नहीं फिर | आप अपने शरीर से अलग हो गये तो होगा भी नहीं फिर |
बापूजी : ममता करके खोता-खरा होता है | भय करके मनुष्य |
घाट वाले बाबाजी : शरीर का ही सारा दुःख, पाप-पूण्य होता है | शरीर को अपना नहीं मानो, कुछ नहीं
होगा | शरीर के सुख के लिए पाप-पूण्य करता है ना आदमी | शरीर के लिए सब कुछ करता है ना,
दूकानदारी, नौकरी-चाकरी, व्यापार |
बापूजी : शरीर की वाह-वाही के लिए ही |
साधक : वाह-वाही तो झूठी है | सरकार की ….. | समझो के अपन बहुत पैसा कमावे, तो टैक्स बहुत
देना पड़े |
बापूजी : हजारों आदमी को बोल के आये, वचन देके आये के घाट वाले आयेंगें तो ठीक है नहीं तो
उनके चित्र को ले आयेंगें | फिर आप उसमें सहयोग दो | संत सहयोग देते हैं, अनुकूल करो |
घाट वाले बाबाजी : अरे हमारा फोटो नहीं |
बापूजी : लाओ इधर करो उनका हाथ दिखा देता हूँ, इधर | आपके प्रारब्ध में एकांत लिखा हुआ है और
आशारामजी अहमदाबाद वाले हैं, उनका संग होगा आपको |
घाट वाले बाबाजी : संग तो हो ही गया है | संग तो हो ही गया है ना |
बापूजी : और दूसरा | आपकी कभी-कभी रूचि होती है मोटेरा चलने की लेकिन इधर की जो है ना,
बिरला घाट की रहने की थोड़ी मन को, शरीर को आदत पड़ गयी है उस लिए आप नहीं जाते हैं |
वरना आप, ये लोग आग्रह करे तो आप कभी मोटेरा आ भी सकते हैं | आप सहयोग दें | आप अपना
संकल्प छोड़ दे बिरला घाट का तो आप मोटेरा भी आ सकते अहिं | ये लिखा है |ये देखो ये सीधी
मोटेरा की लकीर है | सीधी रेल गाडी है मोटेरा की |

घाट वाले बाबाजी : रखो जी, बैठो आराम से | डूब जाना है |
बापूजी : ब्रह्म में डूब जाना है | डूबेगा कौन ?
घाट वाले बाबाजी : जो चिदाकाश है वह डूबेगा | जो आज अपने को पृथक मान रहा है वो ही डूबेगा |
बापूजी : चिदाकाश डूबेगा ब्रह्म में | अब चिदाकाश और ब्रह्म दोनों एक ही तो है |
घाट वाले बाबाजी : उसी का भास है ना | शरीर के साथ मिलकर के सुखी-दुखी हो रहा है |
बापूजी : शरीर के साथ मिला कैसे ?
घाट वाले बाबाजी : माना हुआ, मिला तो नहीं, मान लिया है अपना, अपना मान लिया है |
बापूजी : माना भी कौन ?
घाट वाले बाबाजी : वही, चिदाकाश मान लिया, जड़ से सुख चाहने लग गया | क्यों माना, कैसे माना,
इसको छोड़ दो | बस, कैसे निवृत हो ये सोचना है |
बापूजी : दाग कहाँ लगा उसकी चिंता मत करो, दाग मिटा दो बस | ठीक है, समझ गये | और पूछना
है कुछ |आज ये देह, आज ८० साल की उम्र में ये ऐसा लोगों के समीप एकांत में बोलते हैं, पूछ लो,
मौका है, रिझा लिया है बाबा को |
घाट वाले बाबाजी : अब बस करो, हो गया |
बापूजी : आपको डर है कुछ ?
घाट वाले बाबाजी : बात चित करो, ये क्या ?
बापूजी :  वो बात-चित तो ५ मिनट में पूरी हो जाएगी | ये तो ५० साल, १००० साल के बाद भी चलती
रहेगी |
घाट वाले बाबाजी : इससे लाभ क्या होगा ?
बापूजी : लाभ होगा | महापुरुष जिस रास्ते से गये हैं वो दूसरों को पद चिन्ह दिख जायेंगें | मुंड मर
जाते हैं |
घाट वाले बाबाजी : यही नहीं दीखता तो और क्या |
बापूजी : नहीं यहाँ साधन नहीं न देखने का, उसमें दिखायेंगे तो, विडियो लायेंगें ना तो उसमें दिखेगा |
घाट वाले बाबाजी : रियल है ?
बापूजी : नहीं अभी लाइव नहीं | नहीं स्वामीजी नहीं चलेंगें, उसी लिए तो फिल्म उतर रहे हैं | चलते तो
वही फिल्म होती | चलेंगें नहीं | इनका बाबा वो बिरला घाट में मोह हो गया है | लोगों को बोलते हैं
मोह छोड़ो,
घाट वाले बाबाजी : हाँ, हमको मोह हो गया है | उनकी बात ना मनो कोई |
बापूजी : स्वामीजी को मो हो गया है |
घाट वाले बाबाजी : यहाँ भी मोह गया है |
बापूजी : जंगल में भी मोह हो गया है, ये बांस की ४ , ४ बांस के पेड़ो में मोह हो गया है |
घाट वाले बाबाजी : कोई मोह छुड़ाने वाला नहीं है |
बापूजी : मोह तभी छूटेगा आप चलो अहमदाबाद, एकदम मोह छुटेगा |
घाट वाले बाबाजी : छुड़ा दो तो चलते हैं |
बापूजी : भई, आप छोड़ दो, मोह तो है नहीं आप ऐसे ही जान बुझ के दिखाते हो लोगों को |
घाट वाले बाबाजी : नहीं है, तो कहे के लिए ले जाओगे ? जब मोह है ही नहीं तो फिर किसको ले
जाओगे ?

बापूजी : नहीं, मोह नहीं है तो फिर चल दो | जब मोह है तो रहो |
घाट वाले बाबाजी : मोह ले जा हमारा |
बापूजी : हम आपको ही ले जायेंगें तो मोह-वोह अपने आप भाग जायेगा |
घाट वाले बाबाजी : ना, ना मोह को ले जा, हमारे को छोड़ दे | नहीं अहमदाबाद को यहाँ ले आओ |
बापूजी : पूरा अहमदाबाद को ?  ये तो लाया हूँ ना अहमदाबाद को
घाट वाले बाबाजी : ये नहीं, सारा, चने के पहाड़ के ऊपर रख दो | सब मोटेरा-वोटर यहीं आ जाएँ |
योगी लोग तो कर लेते है |
बापूजी : वो बड़े योगी लोग, हम कोई बड़े योगी हैं ?
घाट वाले बाबाजी : ला दोगे तो बड़े योगी हो जाओगे |
बापूजी : ये बोलते हैं आप बिरला घात नहीं छोड़ते हैं और अहमदाबाद चलने के लिए इनकार करते हैं
| इंकार करने का कारण क्या के भई वहाँ दुःख मिलेगा इसीलिए अथवा यहाँ आपको सुख मिल गया
है उस लिए |
घाट वाले बाबाजी : हाँ, यहाँ सुख मिलता है | वहाँ कैसा है क्या पता ? यहाँ हमारा गंगा माई है |
पानी-वाणी की सब सुविधा है |
बापूजी : वहाँ भी सुविधा है, साबर माई है |
घाट वाले बाबाजी : वो क्या पता कैसा होगा | यहाँ प्रत्यक्ष को छोड़ के अप्रत्यक्ष के पीछे दौड़े |
बापूजी : वो भी प्रत्यक्ष हो जायेगा |
घाट वाले बाबाजी : हो जायेगा, अभी तो नहीं है |
बापूजी : बोलते हैं साधू बहता पानी निर्मला |
घाट वाले बाबाजी : वो साधू लोग होते हैं, मैं साधू तो नहीं हूँ | मैं तो जंगली, जंगल में रहता हूँ |
बापूजी : आप साधू नहीं हैं | चलो भाई अपने गलत जगह पे आ गये | १२ साल से आपके परिचय में
हैं, हमको पता होता तो फिर आते भी नहीं |
घाट वाले बाबाजी : चलो अभी कुछ बिगड़ा नहीं |
बापूजी : हम तो साधू समझ के आ रहे थे |
घाट वाले बाबाजी : आप समझ लिया गलत है ना |
बापूजी : साधू नहीं होता, संत संत होता है | संत भी कल्पा हुआ शब्द है, साधू भी कल्पा हुआ शब्द है
| ब्रह्म ब्रह्म ही होता है | साधू होता है ना असाधु होता है | जो साधू है तो असाधु भी छुपा है अंदर |
ऐसे है | नाम-रूप से परे है | साधू कैसे हुए, साधू भी तो नाम है | अच्छा आप नाम रूप से परे हैं ?
घाट वाले बाबाजी : पता नहीं क्या है ? क्या है ?
बापूजी : बताओ आप क्या है ?
घाट वाले बाबाजी : पता नहीं तो क्या बताऊ | पता बता दो हमारा | आप जो भी हो पता बताना |
केसरिया बता दे |
बापूजी : आप क्या हैं वैसे तो बता दो | आप नाम तो बताते नहीं अपना | लोगो ने थोप दिया ये टाट
वाला, घाट वाला, बाट वाला | चलो ठीक है चलता है लेकिन आप क्या हैं वो तो बता दो, जीव हैं, ब्रह्म
हैं, भगत हैं, साधक हैं, अथवा कोई डाका-वाका डाल के फिर साधू होने वाले हैं |
घाट वाले बाबाजी : ऐसे ही समझ लो | जितने डाकू होते हैं वो साधू तो होते ही हैं |
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