प्रश्नोत्तरी

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आध्यात्मिक

तात्त्विक

जगत है ही नहीँ, उसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

Admin 0 9129 Article rating: 4.3
 पूज्य बापूजी : जगत है भी, जैसे सपना दिख रहा है उस समय सपना है ; ये जगत नहीँ है ऐसा नहीँ लगता । जब सपने में से उठते हैं तब लगता है कि सपने की जगत नहीँ हैं । ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो ,फिर जगत की सत्यता नहीँ दिखती ; तो बोले जगत नहीँ हैं । 
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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

How to obtain Saraswatya mantra diksha?

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Guruji I wanted a saraswati mantra diksha from you. I want to excel in my studies. Im surprised to see so much miracles and blessings you are showering upon your followers

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ध्यान विषयक

निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

Admin 0 6002 Article rating: 4.3
श्री हरि प्रभु ! चालू सत्संग में जब मन निःसंकल्प अवस्था में विषय से उपराम होकर आने लगता है ,तो प्रायः निद्रा का व्यवधान क्यों होता है और उसका निराकरण कैसे होता है प्रभु ?

ध्यान की अवस्था में कैसे पहुंचे ? अगर घर की परिस्थिति उसके अनुकूल न हो तो क्या करे ?

Admin 0 3239 Article rating: No rating

ध्यान  की  अवस्था  में  कैसे  पहुंचे ? अगर  घर  की  परिस्थिति  उसके  अनुकूल  न  हो  तो  क्या  करे ?

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/ Categories: Rishi Prasad QA

गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन में संशय उत्पन्न हो जाता है

प्रश्न :- गुरुदेव ! सबकुछ जानते हुए भी मन मे संशय उत्पन्न हो जाता है। 
पूज्य बापूजी :- सब कुछ क्या जानते है ?
प्रश्नकर्ता :- जैसे कोई सही चीज हो तो उसके विषय मे मन में द्वंद उत्पन्न होने लगता है कि यह ऐसा है कि ऐसा है ?
पूज्य बापूजी :- जब सब कुछ जानते हो तो द्वंद कैसे उत्पन्न होता है ? 
प्रश्नकर्ता :- मालूम है संसार झूठ है फिर भी मन उसमे उलझता है। 
पूज्य बापूजी :- हाँ तो अपने पुराने संस्कार है न, तो होता है। मिथ्या संसार सच्चा लग रहा है क्योंकि पुराने संस्कार है कई जन्मों के और उनको सच्चा मान कर जी रहे है और अभी केवल सुनकर एकदम से दृढ़ता नही होती तो द्वंद होता है। संसार के मिथ्यात्व के प्रति सजग रहना, यही तो सावधानी है। इसी को तो साधना कहते है। सावधानी का नाम ही साधना है। यही पुरुषार्थ है। पुरुषस्य अर्थ इति पुरुषार्थः। उस परमात्मा के अर्थ प्रयत्न करना, कोशिश करना पुरुषार्थ है। किसी ने रुपये पैसे कमाये, पद पाया तो बोले : अरे ! 'इसने पुरुषार्थ किया।' क्या खाक पुरुषार्थ किया ! वह तो प्रकृति-अर्थ किया। पुरुषार्थ तो यह है कि भगवान में टिकने का यत्न हो। यह पुरुषार्थ करो, 'ईश्वर की ओर' पढो और दूसरी कोई छोटी मोटी पुस्तक-सत्साहित्य पढो अथवा जहाँ रहते हो वही ऐसे विचार करो कि 'आखिर यह कब तक ? यह भी गुजर जाएगा, यह भी बीत जाएगा, यह भी नही रहेगा, परमात्मा के सिवाय सब सपना है, उसको जानने वाला प्रभु अपना है' आदि-आदि। ऐसे सूत्र घरो में दीवालों पर लिखे रहे तो ये पक्के हो जाएंगे। ये सभीके फायदे के लिए है।
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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

पूज्य श्री - सुरेशानंदजी प्रश्नोत्तरी

Admin 0 5844 Article rating: 3.5
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