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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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Admin
/ Categories: PA-000437-Q&A

काम, क्रोध, लोभ में आकर मैंने कई अयोग्य व्यवहार किये है। क्या मुझे ईश्वर प्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी :- पहले जो गलती की , पाप किया उसके लिए बन्द कमरे में भगवान के आगे रोकर माफी माँग लो और दोबारा न करने का दृढ़ संकल्प करो। और पुकारो
     ' दीन दयाल बिरिदु संभारी। 
       हरहु नाथ मम संकट भारी।। 
हे प्रभु ! रजोगुण, तमोगुण के माहौल में फिसलाहट होती है, रक्षा करो मुझे बचाओ। प्रतिदिन गलती न करने का संकल्प दोहराओ। सुबह गहरा श्वास लेकर ॐकार का दीर्घ जप करो। अपनी उस गलती को सामने लाकर भगवान की कृपा की गदा लगा दो फिर शांत हो जाओ। भगवान के बल से रक्षित, पोषित होने से अब यह गलती नही करेंगे। और मैंने गलती की नही, गलती तो मन ने, शरीर ने, बुद्धि में की। मैं तो परमात्मा का, परमात्मा मेरे। अपने में गलती मानोगे और निकालोगे तो मेहनत ज्यादा पड़ेगी। मन, इंद्रियों द्वारा गलती दोबारा नही होगी - ऐसा प्रयत्न करके अपने को भगवान में शांत करते जाओ तो आपका बल बढ़ जाएगा, फिर बुद्धि आपको नही घसीटेगी। आप बुद्धि को ठीक करने जाओगे तो मन, इन्द्रियाँ आपको घसीटेगी। साधक के जीवन में यह बड़ी लड़ाई आ जाती है, फिसलाहट आ जाती है, सफल होने पर अहंकार आ जाता है। अहंकार आते ही 'जरा इतना खा लिया, जरा यह कर लिया तो क्या फर्क पड़ता है !'  फिर फिसलने लग जाता है। ऐसी स्थिति में सावधान रहें। 
साँच बराबर तप नही, झूठ बराबर पाप। 
जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप।। 
सत्य का आश्रय ले तो जल्दी ईश्वरप्राप्ति होगी।
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