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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

“देखिये, सुनिए, बुनीये मन माहि, मोह मूल परमार्थ नाही” | इसका मतलब बताइए आप पूज्य श्री - घाटवाले बाबा प्रश्नोत्तरी ४

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

कैसे जाने की हमारी साधना ठीक हो रही है ? कैसे पता चले के हम भी सही रस्ते है? कौनसा अनुभव हो तो ये माने की हमारी साधना ठीक चल रही है ?

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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Admin
/ Categories: PA-000437-Q&A

गुरुदेव की सेवा किसे कहते है और कैसे करे ?

पूज्य बापूजी :- गुरु की सेवा है उनकी आज्ञा को जितना हो सके ठीक समझकर अपने जीवन में उतारे। 
  अग्या सम न सुसाहिब सेवा। 
(श्री रामचरित. अयो. कां. :३००.२)
उत्तम सेवक सेवा खोज लेता है, उसे पता चल जाता है। मध्यम को संकेत करना पड़ता है और निम्न सेवक को आज्ञा देनी पड़ती है। चौथी और पांचवी श्रेणी का सेवक तो आज्ञा मिलने के बाद भी टालमटोल करेगा, दूसरे को कहेगा : 'यह कर दे, वह कर दे..' गुरूजी कुछ कहे तो तुरंत जबाब देना चाहिए। गुरूजी कुछ पूछे और वह मौन रहे, कोई उत्तर न दे तो वह सेवक या शिष्य कहलाने लायक नही है, नालायक है। 
    गुरु सत्संग में भी हमारे लिए संकेत करते है। उस संकेत पर अमल करके उनकी आज्ञा मान ली तो हो गयी गुरु की सेवा। गुरु बोलते रहे और हम अपने अहं को पोसने में लगे रहे तो हो गया गुरु की आज्ञा, गुरुसेवा का गला घोंटना। 

ऋषि प्रसाद { १ अक्टूबर २०१६ }

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