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परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

परमात्मप्राप्ति में नियमो का पालन जरुरी है कि सिर्फ परमात्मा के प्रति तड़प बढ़ाने से ही परमात्मप्राप्ति हो सकती है

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

पूज्य बापूजी ! ईश्वरप्राप्ति हमारा लक्ष्य है लेकिन व्यवहार में हम भूल जाते है और भटक जाते है। कृपया व्यवहार में भी अपने लक्ष्य को सदैव याद रखने की युक्ति बताये।

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आश्रमवासी द्वारा उत्तर

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ध्यान विषयक

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/ Categories: PA-000444-Meditation

आत्मचिंतन कैसे करना चाहिए ? आत्मसाक्षात्कार हो जाने पर पूरी दुनिया कैसी लगती है ?

पूज्य बापूजी :- आत्मचिंतन का मतलब है 'अपना 'मैं' जहाँ से उठता है, जो सत् है, चित् है, आनन्द है, जो दुःख को देखता है, सुख को जानता है वह कौन है?' - ऐसा चिंतन। हानि-लाभ, अनुकूलता-प्रतिकूलता आने और मूढ़ उनमे डूब जाते हैजबकी आत्मचिंतन करने वाले दोनों का मजा लेते है : मैं इनका द्रष्टा हूँ,साक्षी हूँ, असंग हूँ।' ' मैं कौन हूँ ?' चिंतन करके शांत होगा उत्तर भी आएगा, अनुभव भी होगा। श्री योगवासिष्ठ महारामायण, विचारसागर, विचार चंद्रोदय आदि ग्रन्थों का अध्ययन करके अथवा 'श्री नारायण स्तुति' पढ़कर शांत हो जाओ। 
   आत्मसाक्षात्कार होने पर दुनिया वैसी ही दिखेगी जैसी अभी दिखती है लेकिन लोगो को सच्ची दिखती है, आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष को मिथ्या अथवा स्वप्नवत् दिखती है, भगवदरूप दिखती है, ब्रम्हरूप दिखती है। तुमने अँधेरे में दूर से सांप देखा, डरकर काँपने लगे। बत्ती ले के आये, नजदीक से देखा तो 'अरे ! यह तो रस्सी है।' फिर वापस उसी जगह पर आ गए। अभी भी सांप जैसा दिखता है लेकिन अब सांप का डर नही रहेगा। एक बार देख लिया चाहे फिर पहले कैसी भी कल्पना की हो, वे सब हट गयी। जो है सो है... फिर संसार से सुख लेने की कामना नही होगी। अपने आप में तृप्ति होगी, संतुष्टि होगीऔर 'अपना आपा केवल शरीर में नही, अनन्त ब्रम्हांडो में व्याप रहा है' ऐसा अनुभव होगा। वह अनुभव कैसा होगा वहाँ वाणी नही जाती। ब्रम्हा, विष्णु, महेश और उनके लोको भी व्यापकर ब्रम्हावेत्ता सभी को अपने आप में ही जानते है। वे चिदाकाशमय हो जाते है। जैसे आकाश सबमे - सब आकाश में, ऐसे ही चिदाकाश स्वरूप पूज्यनीय पुरुष। यहाँ बयान नही होता है। मत करो वर्णन हर बेअंत है। फिर भी वर्णन अपनी दृष्टि से किया साधको समझाने हेतु।

 

ऋषि प्रसाद { १ अक्टूबर २०१६ }

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Q&A with Sureshanand ji & Narayan Sai ji

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