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भविष्य पुराण में मलमास वर्णन

जिस महीने में पूर्णिमा का योग न हो, वह प्रजा, पशु आदि के लिये अहितकर होता हैं | सूर्य और चन्द्रमा दोनों नित्य तिथिका भोग करते हैं | जिन तीस दिनों में संक्रमण न हो, वह मलिम्लुच, मलमास या अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) कहलाता हैं, उसमें सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती | प्राय: अढाई वर्ष (बत्तीस मास) के बाद यह मास आता है | इस महीने में सभी तरह की प्रेत-क्रियाएँ तथा सपिण्डन-क्रियाएँ की जा सकती हैं | परन्तु यज्ञ, विवाहादि कार्य नहीं होते | इसमें तीर्थस्नान, देव-दर्शन, व्रत=उपवास आदि, सीमन्तोन्नयन, ऋतूशांति, पुंसवन और पुत्र आदि का मुख-दर्शन किया जा सकता हैं | इसी तरह शुक्रास्त में भी ये क्रियाएँ की जा सकती हैं | राज्याभिषेक भी मलमास में हो सकता है | व्रतारंभ, प्रतिष्ठा, चूडाकर्म, उपनयन, मंत्रोपासना, विवाह, नूतन-गृह निर्माण, गृह-प्रवेश, गौ आदिका ग्रहण आश्रमान्तर में प्रवेश, तीर्थ-यात्रा, अभिषेक-कर्म, वृषोत्सर्ग, कन्या का द्विरागमन तथा यज्ञ-यागादि – इन सबका मलमास में निषेध है | इसीतरह शुक्रास्त एवं उसके वार्धक्य और बाल्यत्व में भी इनका निषेध हैं | गुरुके अस्त एवं सूर्यके सिंह राशि में स्थित होनेपर अधिक मासमें जो निषिद्ध कर्म हैं, उन्हें नहीं करना चाहिये | कर्क राशि में सूर्य के आनेपर भगवान् शयन करते हैं और उनके तुला राशिमें आनेपर निद्रा का त्याग करते है |
इति श्री अध्याय तीसरा

– हरि ॐ हरि ॐ –

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