Akshay tritya hariom Bapuji hindu ashram

 

अक्षय तृतिया को दिये गये दान, किये गये स्नान, जप-तप व हवन आदि शुभ कर्मों का अनंत फल मिलता है। 'भविष्य पुराण' के अनुसार इस तिथि को किये गये सभी कर्मों का फल अक्षय हो जाता है, इसलिए इसका नाम 'अक्षय' पड़ा है। 'मत्स्य पुराण' के अनुसार इस तिथि का उपवास भी अक्षय फल देता है। त्रेतायुग का प्रारम्भ इसी तिथि से हुआ है। इसलिए यह समस्त पापनाशक तथा सर्वसौभाग्य-प्रदायक है।

यदि चतुर्दशी के दिन आर्द्रा नक्षत्र का योग हो तो उस समय किया गया प्रणव (ॐ) का जप अक्षय फलदायी होता है।

(शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)

जोधपुर से पूज्य बापूजी का संदेश (2015)

मिडिया : बापूजी अक्षय तृतीया है 
पूज्य श्री : अक्षय तृतीय है तो जप करना , मनोरथ फलता है , कई गुणा  फल होता है 

साधना में सहायक

बच्चे बच्चियाँ  ध्यान देना बेटे, 

अक्षय तृतीया के दिन किसी भी इच्छा से तुम जप करोगे तो वह  जप तुम्हारा १०,००० गुना फल देगा। चाहे भगवान की प्रीति के लिए करो, चाहे भगवान के ज्ञान के लिए करो, चाहे भागवत रस के लिए करो, चाहे ब्रह्मचर्य पालने के लिए करो, चाहे कुटुंब में सुख शांति के लिए करो, जिस के लिए भी जप करोगे वह फलेगा अक्षय तृतीया को।आप आरोग्य का मंत्र जप करोगे निरोग रहोगे ,धन प्राप्ति का मंत्र करोगे तो घर में लक्ष्मी रहेगी |इश्वरप्राप्ति का मंत्र करोगे  तो भगवान में प्रीति होगी |

अक्षय तृत्या

वैशाख शुक्ल तृतीया की महिमा मत्स्य, स्कंद, भविष्य, नारद पुराणों व महाभारत आदि ग्रंथो में है । स दिन किये गये पुण्यकर्म अक्षय (जिसका क्षय न हो) व अनंत फलदायी होते है, अत: इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते है । यह सर्व सौभाग्यप्रद है । 
यह युगादि तिथि यानी सतयुग व त्रेतायुग की प्रारम्भ तिथि है । श्रीविष्णु का नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी के रूप में अवतरण व महाभारत युद्ध का अंत इसी तिथि को हुआ था ।
इस दिन बिना कोई शुभ मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ या सम्पन्न किया जा सकता है । जैसे – विवाह, गृह – प्रवेश या वस्त्र -आभूषण, घर, वाहन, भूखंड आदि की खरीददारी, कृषिकार्य का प्रारम्भ आदि सुख-समृद्धि प्रदायक है ।


प्रात:स्नान, पूजन, हवन का महत्त्व 
इस दिन गंगा-स्नान करने से सारे तीर्थ करने का फल मिलता है । गंगाजी का सुमिरन एवं जल में आवाहन करके ब्राम्हमुहूर्त में पुण्यस्नान तो सभी कर सकते है । स्नान के पश्चात् प्रार्थना करें :

माधवे मेषगे भानौं मुरारे मधुसुदन ।
प्रात: स्नानेन में नाथ फलद: पापहा भव ॥

‘हे मुरारे ! हे मधुसुदन ! वैशाख मास में मेष के सूर्य में हे नाथ ! इस प्रात: स्नान से मुझे फल देनेवाले हो जाओ और पापों का नाश करों ।’
सप्तधान्य उबटन व गोझरण मिश्रित जल से स्नान पुण्यदायी है । पुष्प, धुप-दीप, चंदनम अक्षत (साबुत चावल) आदि से लक्ष्मी-नारायण का पूजन व अक्षत से हवन अक्षय फलदायी है । 

जप, उपवास व दान का महत्त्व –
इस दिन किया गया उपवास, जप, ध्यान, स्वाध्याय भी अक्षय फलदायी होता है । एक बार हलका भोजन करके भी उपवास कर सकते है । ‘भविष्य पुराण’ में आता है कि इस दिन दिया गया दान अक्षय हो जाता है । इस दिन पानी के घड़े, पंखे, ओले (खांड के लड्डू), पादत्राण (जूते-चप्पल), छाता, जौ, गेहूँ, चावल, गौ, वस्त्र आदि का दान पुण्यदायी है । परंतु दान सुपात्र को ही देना चाहिए । पूज्य बापूजी के शिष्य पूज्यश्री के अवतरण दिवस से समाज सेवा के अभियानों में नए वर्ष का नया संकल्प लेते है । अक्षय तृतीया के दिन तक ये अभियान बहार में आ जाते है, जिससे उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है ।


पितृ-तर्पण का महत्त्व व विधि – 
इस दिन पितृ-तर्पण करना अक्षय फलदायी है । पितरों के तृप्त होने पर घर ने सुख-शांति-समृद्धि व दिव्य संताने आती है ।
विधि : इस दिन तिल एवं अक्षत में श्रीविष्णु एवं ब्रम्हाजी को तत्त्वरूप से पधारने की प्रार्थना करें । फिर पूर्वजों का मानसिक आवाहन कर उनके चरणों में तिल, अक्षत व जल अर्पित करने की भावना करते हुए धीरे से सामग्री किसी पात्र में छोड़ दें तथा भगवान दत्तात्रेय, ब्रम्हाजी व विष्णुजी से पूर्वजों की सदगति हेतु प्रार्थना करें ।

आशीर्वाद पाने का दिन –
इस दिन माता-पिता, गुरुजनों की सेवा कर उनकी विशेष प्रसन्नता, संतुष्टि व आशीर्वाद प्राप्त करें । इसका फल भी अक्षय होता है ।

अक्षय तृतीया का तात्त्विक संदेश-  
‘अक्षय’ यानी जिसका कभी नाश न हो । शरीर एवं संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान है, अविनाशी तो केवल परमात्मा ही है । यह दिन हमें आत्म विवेचन की प्रेरणा देता है । अक्षय आत्मतत्त्व पर दृष्टी रखने का दृष्टिकोण देता है । महापुरुषों व धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा और परमात्म प्राप्ति का हमारा संकल्प अटूट व अक्षय हो – यही अक्षय तृतीया का संदेश मान सकते हो ।

स्त्रोत ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०१३ से

अक्षय-तृतीया व्रत के प्रसंग में धर्म वणिक् का चरित्र

(भविष्यपुराण उत्तरपर्व-अध्याय – १९)

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! अब आप वैशाख मासके शुक्ल पक्ष की अक्षय-तृतीया की कथा सुने | इस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, तर्पण आदि जो भी कर्म किये जाते हैं, वे सब अक्षय हो जाते हैं | सत्ययुग का आरम्भ भी इसी तिथि को हुआ था, इसलिये उसे कृतयुगादि तृतीया भी कहते हैं | यह सम्पूर्ण पापों का नाश करनेवाली एवं सभी सुखों को प्रदान करनेवाली हैं | इस सम्बन्ध में एक आख्यान प्रसिद्ध है, आप उसे सुने –

शाकल नगर में प्रिय और सत्यवादी, देवता उअर ब्राह्मणों का पूजक धर्म नामक एक धर्मात्मा वणिक रहता था | उसने एक दिन कथाप्रसंग में सुना कि यदि वैशाख शुक्ल की तृतीया रोहिणी नक्षत्र एवं बुधवार से युक्त हो तो उस दिन का दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है | यह सुनकर उसने अक्षय तृतीया के दिन गंगा में अपने पितरों का तर्पण किया और घर आकर जल और अन्नसे पूर्ण घट, सत्तू, दही, चना, गेहूँ, गुड़, ईख, खांड और सुवर्ण श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दान दिया | कुटुम्ब में आसक्त रहनेवाली उसकी स्त्री उसे बार-बार रोकती थी, किंतु वह अक्षय तृतीया को अवश्य ही दान करता था | कुछ समय के बाद उसका देहांत हो गया | अगले जन्म में उसका जन्म कुशावती (द्वारका) नगरी में हुआ और वह वहाँ का राजा बना | दान के प्रभाव से उसके ऐश्वर्य और धन की कोई सीमा न थी | उसने पुन: बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ किये | वह ब्राह्मणों को गौ, भूमि, सुवर्ण आदि देता रहता और दीन-दुखियों को भी संतुष्ट करता, किन्तु, उसके धनका कभी ह्रास नहीं होता | यह उसके पूर्वजन्म में अक्षय तृतीया के दिन दान देने का फल था | महाराज ! इस तृतीया का फल अक्षय है | अब इस व्रत का विधान सुने – सभी रस, अन्न, शहद, जल से भरे घड़े, तरह-तरह के फल, जूता आदि तथा ग्रीष्म ऋतू में उपयुक्त सामग्री, अन्न, गौ, भूमि, सुवर्ण, वस्त्र जो पदार्थ अपने को प्रिय और उत्तम लगे, उन्हें ब्राह्मणों को देना चाहिये |यह अतिशय रहस्य की बात मैंने आपको बतलायी | इस तिथि में किये गये कर्म का क्षय नहीं होता, इसीलिये मुनियों ने इसका नाम अक्षय-तृतिया रखा हैं |

​Akshaya Tritiya Brings Imperishable Merits

The greatness of Akshaya Tritiya, i.e. the third lunar day of the bright fortnight of the month of Vaishakha is described in Holy Scriptures such as the Matsya, Skanda, Bhavishya and Narada Puranas, the Mahabharata etc. The meritorious deeds performed on  this day produce imperishable result and infinite returns. That is why it is known as Akshaya Tritiya. It enhances good fortunes. This also marks the beginning of the Satya Yuga and the Treta Yuga. It is the birthdate of Nara-Narayana, Hayagriva and Parashurama, the divine incarnations of Lord Vishnu. On this day of Akshaya Tritiya, Veda Vyasa along with Ganesha began writing the great epic of Mahabharata.
It is one of the three auspicious days as per the Hindu electional astrology. So any auspicious act can be initiated and completed on this day without choosing a Muhurta (auspicious time for a venture) from the Panchaanga (almanac). Such acts as marriage, house-entering, making new purchases of – clothes, gold ornaments, a house, a vehicle, a piece of land, etc.; and beginning of some agricultural work when done on this day bring happiness and prosperity.
Importance of bathing, worshipping and doing hawan in the morning.
The act of bathing in the river Ganga on this days accrues religious merits equal to that earned by visiting all pilgrim places. In case it is not possible, one can definitely earn religious merits by bathing in the Brahma Muhurta (two hours before sunrise) at home itself by first remembering mother Ganga with reverence and invoking her blessed presence in the bath-water. Do pray after taking your bath:
माधवे मेषगे भानौं मुरारे मधुसुदन ।
प्रात: स्नानेन में नाथ फलद: पापहा भव ॥
Meaning: “ O Lord Murari! O Lord Madhusudana! Please be the giver of religious merits of bathing in the early morning with the Sun in the constellation of Aries, and thereby destroy all my sins!
The practice of bathing after applying the unguent made from the powders of seven grains and mixing pious urine of the Desi cow to the batch water gives religious merits. One can earn never-diminishing religious merits by worshipping Lord Narayana and His consort Goddess Lakshmi with flowers, essence, pious lamp, sandalwood paste, unbroken rice, etc. and doing havan with unbroken rice.


Importance of Japa, Fast and Donation

Doing Japa, keeping fast, practicing meditation, self-study, etc. on this day gives never-diminishing fruits as well. One can keep fast even by having a single light meal in a day. The ‘Bhavishya Purana’ states that the religious gifts bestowed on this day become inexhaustible. The donation of specific items like a pitcher, a fan, Oles (balls of sugar), sandals, an umbrella, barley, wheat, rice, cow, clothes etc. imparts religious merits. However, donation ought to be given to a truly deserving and virtuous person. On the most auspicious occasion of Pujyashree’s incarnation day itself the disciples of Pujya Bapuji make a new resolve to begin fresh campaigns of social service in the new year; and by Akshay Tritiya such benevolent campaigns reach their altruistic peak, which endow them with never-diminishing religious merits.
Offering of water to ancestors on this day yields never-diminishing religious merits. Satisfaction of the ancestors paves the way for peace, happiness and prosperity as well as for the birth of divine souls in the family.


Procedure: Invite Lord Vishnu and Lord Brahma in their subtle forms to the sesame seeds and unbroken rice respectively. Then invoke your ancestors and pour the mixture of sesame seeds, unbroken rice and water into a vessel thinking as if you are offering that to your ancestors. Thereafter, pray to Lords Dattatreya, Brahmaji and Vishnuji for the emancipation of your ancestors.


A Day of Receiving Blessings

On this auspicious day one should serve parents and elders to satisfy them and get their blessings.


The Spiritual Import of Akshaya Tritiya

The term ‘Akshay’ means imperishable. Everything, including your body and the things of this entire world are perishable. The Supreme Self or the Lord Supreme alone is imperishable. This day inspires us for Self-analysis. It gives us the right perspective to keep our gaze focused on the imperishable Self. The real message of ‘Akshaya Tritiya’ is to keep our faith in great men and Dharma unswerving, and our resolve or attaining God indestructible.

- Rishi Prasad April 2013